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गोरखनाथ मंदिर में विजयादशमी की अनूठी परंपरा, गुरु गोरखनाथ के पूजन से लेकर प्रभु श्रीराम के राजतिलक तक निभाई जाती है आस्था की विरासत

गोरखपुर (राजू ,स्टेट हेड): उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री एवं गोरक्षपीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ के गृह जनपद गोरखपुर में विजयादशमी का पर्व विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखता है। यहां गोरखनाथ मंदिर में महायोगी गुरु गोरखनाथ की विशेष पूजा-अर्चना से लेकर भव्य विजय शोभायात्रा और भगवान श्रीराम के राजतिलक तक, सदियों पुरानी परंपराओं का निर्वहन किया जाता है।

गुरु गोरखनाथ के पूजन से होती है शुरुआत

गोरखपुर स्थित विश्वप्रसिद्ध गोरखनाथ मंदिर में विजयादशमी का पर्व केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि नाथपंथ की आध्यात्मिक विरासत और लोककल्याण की कामना का प्रतीक है।परंपरा के अनुसार, विजयादशमी के दिन गोरक्षपीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ विशेष धार्मिक परिधान में शिवावतार महायोगी गुरु गोरखनाथ, जिन्हें श्रद्धालु श्रीनाथ जी के नाम से भी जानते हैं, का विधि-विधान से पूजन-अर्चन करते हैं।वैदिक मंत्रोच्चार के बीच मंदिर के शक्तिपीठ, विभिन्न देव विग्रहों और अपने गुरु ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ सहित संतों की समाधियों पर श्रद्धा अर्पित करने की परंपरा भी इस पर्व को विशेष बनाती है।वर्ष 2025 में भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विजयादशमी पर विशेष पूजन-अनुष्ठान कर प्रदेशवासियों के सुख, शांति और समृद्धि की कामना की थी।
तिलकोत्सव और विजय शोभायात्रा का आकर्षण

गोरक्षपीठ की विजयादशमी परंपरा में तिलकोत्सव का भी विशेष महत्व है। इस अवसर पर साधु-संत, श्रद्धालु और जनप्रतिनिधि गोरक्षपीठाधीश्वर से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।इसके बाद निकलने वाली पारंपरिक विजय शोभायात्रा में आस्था, भक्ति और लोकसंस्कृति का अद्भुत संगम दिखाई देता है। रथ, पारंपरिक वाद्ययंत्र, जयकारे और श्रद्धालुओं की सहभागिता इस आयोजन को विशिष्ट स्वरूप प्रदान करती है।शोभायात्रा के दौरान मानसरोवर मंदिर में पूजा-अर्चना और अभिषेक की परंपरा निभाई जाती है। इसके बाद मानसरोवर रामलीला मैदान में भगवान श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मण और हनुमान जी की पूजा-आरती के साथ प्रभु श्रीराम का राजतिलक किया जाता है।यह परंपरा संदेश देती है कि अंततः विजय सत्य, धर्म और न्याय की ही होती है।

आस्था के साथ सामाजिक समरसता का संदेश

गोरक्षपीठ की विजयादशमी का एक महत्वपूर्ण पक्ष सामाजिक समरसता भी है। परंपरागत आयोजनों और सामूहिक प्रसाद-भोज के माध्यम से समाज के विभिन्न वर्गों की सहभागिता देखने को मिलती है।

यह पर्व हमें याद दिलाता है कि त्योहारों की वास्तविक सार्थकता केवल धार्मिक अनुष्ठानों में नहीं, बल्कि आपसी सद्भाव, सेवा, करुणा और समाज को जोड़ने के संकल्प में भी निहित है।

गोरखनाथ मंदिर की विजयादशमी परंपरा में गुरु गोरखनाथ की आराधना, संतों का सम्मान, विजय शोभायात्रा और प्रभु श्रीराम के राजतिलक के माध्यम से आस्था और संस्कृति का अनूठा संगम दिखाई देता है।

यहां विजयादशमी केवल रावण पर भगवान श्रीराम की विजय का पर्व नहीं, बल्कि सत्य की स्थापना, अहंकार के अंत और लोककल्याण के संकल्प का भी प्रतीक है।