बाराबंकी (अमित श्रीवास्तव ,विशेष संवाददाता ): सूफी संत हजरत हाजी सैय्यद वारिस अली शाह की नगरी देवा शरीफ एक बार फिर सजने को तैयार है। गंगा-जमुनी तहजीब और हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक माना जाने वाला सालाना उर्स और विश्व प्रसिद्ध देवा मेला इस बार 27 अक्टूबर 2025, सोमवार से शुरू होने जा रहा है। यह मेला कार्तिक महीने में दशहरा और करवा चौथ के बाद 10 दिनों तक चलता है।
प्रशासन और दरगाह कमेटी ने इसकी तैयारियां पूरी कर ली हैं। हर साल की तरह इस बार भी देश-विदेश से लाखों जायरीन और श्रद्धालु देवा शरीफ पहुंचेंगे।
क्या है देवा मेले का इतिहास?
बहुत से लोग इसे वारिस पाक का उर्स समझते हैं, लेकिन हकीकत ये है कि ये उर्स सरकार वारिस पाक के वालिद हजरत कुर्बान अली शाह का है। इसकी तारीख खुद सरकार वारिस पाक ने ही तय की थी। उन्होंने कहा था कि हर साल करवा चौथ के बाद मेरे वालिद का उर्स मनाया जाए और इसी मौके पर मेला लगे।
तभी से यह परंपरा चली आ रही है। सरकार वारिस पाक का अपना उर्स 7 अप्रैल (1 सफर) को मनाया जाता है, जिस दिन उनका विसाल हुआ था।
देवा मेले की सबसे बड़ी खासियत इसका साम्प्रदायिक सौहार्द है। यहां हिंदू और मुसलमान दोनों एक साथ आते हैं। मेले में विशाल पशु बाजार, कव्वाली, मुशायरा, ऑल इंडिया व्यूवर्स, सूफी कांफ्रेंस और सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। यह उत्तर भारत के सबसे बड़े पशु मेलों में से एक है।
कौन थे सरकार वारिस पाक? पूरी कहानी
1. पैदाइश और खानदान:
हजरत हाजी वारिस अली शाह का जन्म बाराबंकी के देवा शरीफ कस्बे में 1817-1819 के बीच, पहली रमजान को हुआ था। उनका ताल्लुक ईरान के निशापुर से आए सैय्यद खानदान से था। वे हजरत इमाम हुसैन की 26वीं पीढ़ी से थे। उनके वालिद का नाम हजरत कुर्बान अली शाह और वालिदा का नाम सकीना बीबी उर्फ चांद बीबी था।
2. बचपन में ही करामात:
वारिस पाक के बचपन में ही वालिद का साया उठ गया। 2 साल की उम्र में वालिद और 3 साल की उम्र में वालिदा का इंतकाल हो गया। उनकी परवरिश उनकी दादी हयातुन्निसा साहिबा ने की। कहा जाता है कि बचपन में ही उनमें अजीब करामात थीं। वो दिन में अपनी माँ का दूध नहीं पीते थे, 10 मोहर्रम को दूध नहीं पीते थे, कभी जोर-जोर से रोते नहीं थे और रात-रात भर चांद-सितारों को देखकर खुदा की इबादत में लगे रहते थे। 5 साल की उम्र में पढ़ाई शुरू की और 7 साल की उम्र में कुरान हिफ्ज़ कर लिया था।
3. 14 साल का सफर और 11 हज:
जवानी में उन्होंने अपने मामू और मुर्शिद ख्वाजा खादिम अली शाह की बैयत ली। उसके बाद उन्होंने 14 साल तक लगातार सफर किया। इराक, ईरान, तुर्की, अफगानिस्तान, मक्का-मदीना तक गए। कहते हैं उन्होंने नंगे पैर हज किया और 7 से 11 बार हज किया। अपने सफर के दौरान वो तुर्की के सुल्तान, जर्मनी के बिस्मार्क और इंग्लैंड में महारानी विक्टोरिया से भी मिले थे।
4. उनकी तालीम और पहचान:
सरकार वारिस पाक हमेशा पीले रंग के कपड़े पहनते थे। इसलिए आज भी उनके मुरीद ‘वारसी’ पीला लिबास पहनते हैं। पीला रंग इश्क-ए-हकीकी और सोने जैसी तपस्या का प्रतीक है। उनकी सबसे मशहूर तालीम थी – “जो रब है वही राम है”। उन्होंने इंसानियत, मोहब्बत और सभी धर्मों की एकता का पैगाम दिया। उन्होंने कहा था कि अपने मुरीद को किसी धर्म को छोड़ने की जरूरत नहीं है, वह अपने ही धर्म में रहकर खुदा को पा सकता है।
5. विसाल:
7 अप्रैल 1905 को जुम्मे के दिन, 86 साल की उम्र में देवा शरीफ में ही उनका विसाल हुआ। उनकी मजार देवा शरीफ में ही है, जहां आज भी हर धर्म के लोग चादर चढ़ाने आते हैं।
27 अक्टूबर से शुरू हो रहे इस मेले में देश के मशहूर कव्वालों की कव्वाली और सूफियाना शाम इस बार आकर्षण का केंद्र रहेगी।



