हमीरपुर ( राम सिंह ,संवाददाता ) : विकासखंड परिसर में आयोजित ‘पोषण भी पढ़ाई भी’ कार्यक्रम का तीन दिवसीय प्रशिक्षण अब सवालों के घेरे में है। बच्चों के पोषण और शिक्षा का पाठ पढ़ाने के लिए बुलायी गईं आंगनबाड़ी कार्यकत्रियां खुद बदहाल व्यवस्थाओं और कथित भ्रष्टाचार की शिकार बन गईं। प्रशिक्षण के दौरान जो हालात सामने आए, उन्होंने पूरे कार्यक्रम की पोल खोलकर रख दी। सोमवार और मंगलवार को हालात इतने बिगड़े कि करीब एक सैकड़ा आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों का गुस्सा फूट पड़ा। आरोप है कि उन्हें परोसा गया भोजन न सिर्फ घटिया था, बल्कि खाने लायक भी नहीं था। नाराज कार्यकत्रियों ने खाना लेने से साफ इनकार कर दिया और थालियां तक वापस लौटा दीं। उनका कहना है कि कागजों में प्रति कार्यकत्री 300 रुपये खर्च दिखाया जा रहा है, लेकिन जमीनी हकीकत में बेहद सस्ता और निम्न स्तर का भोजन दिया जा रहा है। हालांकि प्रशिक्षण के अंतिम दिन बुधवार को खाने की गुणवत्ता में कुछ सुधार जरूर देखने को मिला, लेकिन यह सुधार भी सवालों के घेरे में है, क्या यह सिर्फ मामले को दबाने की कोशिश थी?
सिर्फ खाना ही नहीं, हर व्यवस्था फेल
मामला केवल खराब भोजन तक सीमित नहीं है। भीषण गर्मी के बीच प्रशिक्षण कक्ष में पंखे और कूलर केवल शोपीस बनकर रह गए। पीने के पानी की कोई समुचित व्यवस्था नहीं थी और परिसर में फैली गंदगी ने हालात और बदतर कर दिए। कार्यकत्रियों के अनुसार बैठना तक मुश्किल हो रहा था। सबसे शर्मनाक स्थिति तब सामने आई जब महिला कार्यकत्रियों के लिए शौचालय तक की व्यवस्था नहीं की गई। मजबूरी में उन्हें खुले में लघुशंका के लिए जाना पड़ा, जो उनकी गरिमा के खिलाफ है और प्रशासन की गंभीर लापरवाही को उजागर करता है।
बीमारी और अव्यवस्था, किसकी जिम्मेदारी?
अव्यवस्थाओं का असर स्वास्थ्य पर भी पड़ा। सोमवार को चार आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों की तबीयत बिगड़ गई, जिन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। इसके बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों की ओर से तत्काल कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
‘बजट हजम, सुविधाएं गायब’ का आरोप
कार्यकत्रियों ने आरोप लगाया है कि प्रशिक्षण के नाम पर लाखों रुपये का बजट कागजों में खर्च दिखाकर बंदरबांट की जा रही है, जबकि जमीनी स्तर पर सुविधाएं पूरी तरह नदारद हैं। यहां तक कि एक सैकड़ा से अधिक पैकेट बंद खाना भी वापस करवा दिया गया, जो इस पूरे मामले की गंभीरता को दर्शाता है।
जांच का भरोसा या लीपापोती?
मामले में जिला कार्यक्रम अधिकारी ने जांच की बात जरूर कही है, लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या यह मामला भी सिर्फ जांच और कागजी कार्रवाई तक सिमट जाएगा, या फिर जिम्मेदार अधिकारियों और ठेकेदारों पर वास्तव में कोई सख्त कार्रवाई होगी?
‘पोषण’ के नाम पर चल रहा यह प्रशिक्षण खुद ही कुपोषित व्यवस्थाओं और भ्रष्टाचार का शिकार बन गया। जिन महिलाओं पर बच्चों के भविष्य को संवारने की जिम्मेदारी है, उन्हें ही अपमान और अव्यवस्था का सामना करना पड़ा। बुधवार को प्रशिक्षण भले ही समाप्त हो गया हो, लेकिन यह मामला प्रशासन की कार्यशैली और जवाबदेही पर बड़ा सवाल खड़ा कर गया है। अब देखना होगा कि यह मामला ठंडे बस्ते में जाता है या दोषियों पर सच में कार्रवाई होती है।





