विशेष संवाददाता रज़ी अहमद की खास रिपोर्ट
कर्बला… यह सिर्फ एक इतिहास नहीं, बल्कि इंसानियत के दिल पर लगा वह घाव है जिससे आज चौदह सौ साल बाद भी खून टपक रहा है। सन् 61 हिजरी का वह तपता हुआ रेगिस्तान, जहाँ सूरज आग बरसा रहा था और जमीन भट्टी की तरह जल रही थी। उस तपती रेत पर एक तरफ ज़ुल्म, तख्त और लाखों की बेदर्दी फौज थी, तो दूसरी तरफ हज़रत मुहम्मद स.अ.व. के नवासे इमाम हुसैन अपने चंद वफादारों के साथ भूखे-प्यासे खड़े थे। तीन दिन से पानी पर पहरा था। बहती हुई नदी पास थी, लेकिन मासूम बच्चों के सूखे होंठ पानी की एक-एक बूंद को तरस रहे थे। हवाओं में प्यास की सिसकियाँ थीं और रेत पर सब्र की एक ऐसी दास्तान लिखी जा रही थी, जिसे सुनकर आज भी पत्थरों के दिल पिघल जाते हैं।
जब दर्द की हद पार होने लगी, तो वफ़ा का वह समंदर जागा जिसे दुनिया गाज़ी अब्बास कहती है। इमाम हुसैन के यह भाई, जो लश्कर के अलमदार थे, बच्चों की प्यास और सकीना के आंसू न देख सके। वे शेर की तरह यज़ीदी फौज को चीरते हुए दरिया-ए-फरात की तरफ बढ़े। प्यास चरम पर थी, अंजलि में पानी लिया, लेकिन बच्चों की याद आते ही पानी वापस दरिया में फेंक दिया। कैसी अज़ीम वफ़ा थी! मश्क में पानी भरकर जब वे वापस लौटे, तो कायरों ने छिपकर वार किया। पहले एक बाजू कटा, फिर दूसरा बाजू कटा, लेकिन अब्बास ने हार नहीं मानी और मश्क को दांतों से दबा लिया। मगर जब एक ज़ालिम तीर मश्क पर लगा और पानी बह गया, तो उम्मीद टूट गई। बाज़ुओं के बिना जब वफ़ा का वह अलमदार घोड़े से गिरा, तो उसने भाई हुसैन को पुकारा। इमाम जब पहुँचे, तो बिना बाज़ुओं के भाई की लाश देखकर उनकी कमर टूट गई।
अभी यह ज़ख्म हरा ही था कि कर्बला की रेत पर एक ऐसी दर्दनाक मेहंदी रची, जिसने खुशियों के मायने ही बदल दिए। यह कहानी है इमाम हसन के यतीम बेटे, महज 13 साल के शहजादे कासिम की। जिनकी शादी के दिन थे, हाथों में खुशियों की मेहंदी लगनी थी, लेकिन यहां तो शहादत का सेहरा सजना था। माँ ने लाडले को दूल्हे का लिबास पहनाया, हाथों में मेंहदी रची, लेकिन सेहरा बाँधकर यह मासूम शहज़ादा सेज पर नहीं, बल्कि तलवारों के साए में उतरा। मैदान में ज़ालिमों को इस कमसिन बच्चे पर ज़रा भी तरस नहीं आया। चारों तरफ से हुए वार ने कासिम को घोड़े से गिरा दिया और यज़ीदी घोड़ों की टापों ने उनके उस नाज़ुक बदन को पैरों तले कुचल डाला। जब इमाम हुसैन उनके जनाज़े के बिखरे हुए टुकड़ों को समेटने पहुँचे, तो पूरी कायनात रो पड़ी। वह मेंहदी, जो शादी की गवाह बननी थी, वह कर्बला की तपती रेत पर कासिम के लहू में तब्दील हो गई।
इस मंज़र की भयावहता यहीं खत्म नहीं हुई। उस तपते मैदान में उन 72 पाक रूहों ने अपनी वफ़ा का ऐसा इम्तिहान दिया जिसकी मिसाल कयामत तक नहीं मिलेगी। वहाँ छह महीने का नन्हा अली असगर भी था, जो प्यास से तड़प रहा था। इमाम हुसैन जब उसे गोद में लेकर पानी मांगने गए, तो ज़ालिम हरमला ने पानी की जगह तीन भालों वाला तीर उस मासूम की गर्दन पर मार दिया। बच्चे ने तड़पने के बजाय अपने पिता की गोद में मुस्कुराकर दम तोड़ दिया। वहीं जवान बेटा अली अकबर था, जिसकी छाती में बर्छी का फल अटका था और उसे निकालते वक्त हुसैन का कलेजा बाहर आ रहा था। बूढ़े साथी हबीब इब्न मज़ाहिर थे, जिन्होंने मुस्कुराते हुए अपनी जान कुर्बान कर दी। एक-एक करके हुसैन के 72 जानिसार हक की राह में मिट गए, लेकिन किसी ने बातिल के आगे घुटने नहीं टेके।
आखिर में जब कोई न बचा, तो अल्लाह का वह लाडला बंदा, बदन पर सैकड़ों ज़ख्म खाए हुए अकेले मैदान में उतरा। प्यास से ज़ुबान सूखी थी, बदन लहूलुहान था, लेकिन आँखों में नाना के दीन को बचाने का जज्बा था। जब अस्र की अज़ान गूंजी, तो इमाम हुसैन ने जंग रोक दी और अपने अल्लाह पाक के सामने सजदे में सर झुका दिया। ज़ालिम शिम्र ने इसी हालत में, जब इमाम अल्लाह की इबादत में लीन थे, उनका सर मुबारक धड़ से जुदा कर दिया।
हुसैन का सर तो कट गया, लेकिन उनका सजदा अमर हो गया। यज़ीद अपनी लाखों की फौज, तख्त और ताकत के बावजूद इतिहास के अंधकार में कहीं खो गया, उसका नाम आज एक गाली बन चुका है। लेकिन हुसैन, अपनी शहादत, अपनी प्यास और अपने 72 साथियों की बेमिसाल कुर्बानी के साथ हर इंसाफ पसंद इंसान के दिल के बादशाह बन गए। कर्बला की यह तपती रेत चीख-चीख कर कहती है कि ताकत और तलवारें जिस्म को तो झुका सकती हैं, लेकिन ईमान और सच्चाई को कभी कत्ल नहीं कर सकतीं। हुसैन कल भी ज़िंदा थे, हुसैन आज भी ज़िंदा हैं।




